तबला
तबला एक प्रमुख अवनद्ध वाद्य है जो उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में मुख्य रूप से उपयोग होता है। यह एक लय और गति के मापन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। तबला मुख्यतः दो भागों में बंटा होता है: दायां (जो दाएं हाथ से बजाया जाता है) और बायां (जिसे बाएं हाथ से बजाया जाता है)।
तबला की निर्माण सामग्री
- लकड़ी: तबला मुख्यतः शीशम, नीम और बीजासार की लकड़ी से बनता है, जिसमें आंतरिक रूप से तीन तहों की खोखली और एक ठोस परत होती है। ठोस परत नीचे होती है जिससे तबला अनावश्यक रूप से हिलता नहीं है।
- बायां डगगा: यह पीतल, तांबा, या ताम्र से बना होता है। ताम्र के डगगे अधिकतर टूटने की संभावना के कारण कम प्रचलित हैं।
तबला की प्रमुख भाग
- पड़ूी: दोनों अंगों पर बकरे की खाल लगाई जाती है। दस्तावेज़ में पड़ूी के मुख्य तीन भाग हैं:
- तकनार या चाँट: दाएं तबले की चाँट पर वादन किया जाता है।
- लव: यह चाँट और स्याही के बीच का क्षेत्र है।
- स्याही: यह काले रंग की गोलाकृति होती है जो धातु के चूर्ण से बनती है।
- गजरा: यह तीन पतली डोरियों से बना होता है, जिससे पड़ूी को कसने का काम किया जाता है।
- गट््टा: ये लकड़ी के टुकड़े होते हैं, जिनका उपयोग तबले के स्वर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
- बद्धी: यह चमड़े की पट्टी होती है जिससे तबले की ध्वनि को नियंत्रित किया जाता है।
पखावज
पखावज भी उत्तर भारतीय संगीत का एक प्रमुख अवनद्ध वाद्य है। यह अन्य वाद्यों की संगत में प्रयोग होता है। पखावज में दोनों अंग होते हैं, एक दायां और एक बायां, जिसमें बायां अंग बड़ा होता है।
पखावज की विशेषताएँ
- लकड़ी: यह भी शीशम, बीज, या आम की लकड़ी से बनाया जाता है। इसकी लंबाई लगभग 75 से 80 सेंटीमीटर होती है।
- स्वर निर्माण: बायें मुख पर गीला आटा रखने से ध्वनि गहरी और गंभीर होती है, जबकि दाएं मुख पर स्याही लगाया जाता है।
- ध्वनि पदार्थ: पखावज में दी गई ध्वनि तेज, गूंजती और ध्वन्यीय होती है। यह अन्य वाद्यों के साथ संगत करने के लिए लोकप्रिय है।
निष्कर्ष
तबला और पखावज दोनों ही वाद्य उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दोनों वाद्य की अपनी संरचना, निर्माण की सामग्री और वादन की विशिष्ट तकनीक है, जो उन्हें संगीत की दुनिया में अलग पहचान देती हैं।